ब्रह्मा, विष्णु और शिव (त्रिगुण माया) एक जीवित प्राणी को मोक्ष प्राप्त नहीं होने देते Published on Apr 8, 2018 पवित्र भगवद् गीता आद्या 7 श्लोक 12 से 15 में, ब्रह्मा ने कहा कि हे अर्जुन! अब मैं आपको वह ज्ञान प्रदान करूंगा, जिसे जानकर, और कुछ भी नहीं रह जाएगा। गीता के कथावाचक ब्रह्मा कह रहे हैं कि मेरे इक्कीस ब्राह्मणों के रहने के लिए शास्त्र-आधारित साधना मेरी पूजा से ही शुरू होती है, जिसका उल्लेख वेदों में किया गया है। जीवों की बुद्धि, जो मेरे अधिकार क्षेत्र में है, मेरे हाथ में है। मैं केवल इक्कीस ब्राह्मणों में गुरु हूँ। इसलिए (गीता आद्या 7 श्लोक 12 से 15 तक) जो भी तीन बंदूकों के माध्यम से हो रहा है (रजगुण-ब्रह्मा जी द्वारा जीवों की रचना, सतगुन-विष्णु जी द्वारा संरक्षण, ततमगुन-शिव जी द्वारा विनाश) - मैं (ब्रह्म-काल) केवल हूँ इसका मुख्य कारण। (क्योंकि काल में एक लाख मनुष्यों की हत्या करने और उनका मांस खाने का श्राप है) वे साधु जो मेरी (ब्रह्मा की) साधना करने के बजाय त्रिगुणमयी माया (राजगुर-ब्रह्मा जी, सतगुन-विष्णु जी, और तमगुण-शिव की साधना कर...
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क्या गुरु के बिना मोक्ष संभव है ?
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प्रश्न:- क्या गुरू के बिना भक्ति नहीं कर सकते? उत्तर: - भक्ति कर सकते हैं, परन्तु व्यर्थ प्रयत्न रहेगा। प्रश्न: - कारण बताऐं? उत्तर: - परमात्मा का विधान है जो सूक्ष्मवेद में कहा है कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान। गुरू बिन दोंनो निष्फल है, पूछो वेद पुराण।। कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हों भी गुरू कीन्ह। तीन लोक के वे धनी, गुरू आगे आधीन।। कबीर, राम कृष्ण बड़े तिन्हूं पुर राजा। तिन गुरू बन्द कीन्ह निज काजा।। भावार्थ: - गुरू धारण किए बिना यदि नाम जाप की माला फिराते हंै और दान देते हैं, वे दोनों व्यर्थ हैं। यदि आप जी को संदेह हो तो अपने वेदों तथा पुराणों में प्रमाण देखें। श्रीमद् भगवत गीता चारों वेदों का सारांश है। गीता अध्याय 2 श्लोक 7 में अर्जुन ने कहा कि हे श्री कृष्ण! मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ। गीता अध्याय 4 श्लोक 3 में श्री कृष्ण जी में प्रवेश करके काल ब्रह्म ने अर्जुन से कहा कि तू मेरा भक्त है। पुराणों में प्रमाण है कि श्री रामचन्द्र जी न...
नाम कौन से राम का जपना चाहिए ?
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गीता जी के अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 16 द्वौ, इमौ, पुरुषौ, लोके, क्षरः, च, अक्षरः, एव, च, क्षरः, सर्वाणि, भूतानि, कूटस्थः, अक्षरः, उच्यते।। अनुवाद: इस संसारमें दो प्रकारके भगवान हैं नाशवान और अविनाशी और ये सम्पूर्ण भूतप्राणियोंके शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है। गीता जी के अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 17 उतमः, पुरुषः, तु, अन्यः, परमात्मा, इति, उदाहृतः, यः, लोकत्रायम् आविश्य, बिभर्ति, अव्ययः, ईश्वरः।। अनुवाद: उत्तम भगवान तो अन्य ही है जो तीनों लोकोंमें प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर परमात्मा इस प्रकार कहा गया है। कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ है, निरंजन वाकी डार। त्रिदेवा (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) शाखा भये, पात भया संसार।। कबीर, तीन देवको सब कोई ध्यावै, चौथा देवका मरम न पावै। चौथा छांडि पँचम ध्यावै, कहै कबीर सो हमरे आवै।। कबीर, तीन गुणन की भक्ति में, भूलि पर्यौ संसार। कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरै पार।। कबीर, ओंकार नाम ब्रह्म (काल) का, यह कर्ता मति जानि। सांचा शब्द कबीर का, परदा माहिं पहिचानि...